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न्यायालय  डॉo सुधीर महादेव बोबडे, माननीय सदस्य, राजस्व परिषद, उ0प्र0, लखनऊ
वाद संख्या:- REV/1720/2020/बाराबंकी
कंप्यूटरीकृत वाद संख्या :-R20200412001720
श्रीमती रीना सिंह बनाम ओम प्रकाश
अंतर्गत धारा:- 210, अधिनियम :- उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता - 2006
आदेश तिथि:- 25/02/2022

आदेश

1-            यह निगरानी धारा-210, उ0प्र0 राजस्व संहिता,2006 के अंतर्गत संस्थित है। निगरानी में अवक्षेपित आदेश, जिलाधिकारी, बाराबंकी द्वारा वाद संख्या-02757/2019 (कम्प्युटरीकृत वाद संख्या-डी0201940120002757 वन विभाग बनाम कन्धई आदि) में धारा-128 उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत पारित आदेश दिनांक 20.11.2020 है। निगरानी में अंतर्ग्रस्त भूमि गाटा संख्या-841 ग्राम टिकरिया, परगना देवां, तहसील, नवाबगंज, जिला बाराबंकी है।

2-            अवक्षेपित आदेश दिनांक 20.11.2020 राजस्व परिषद, लखनऊ के इस न्यायालय में विचाराधीन अन्य निगरानी संख्या-1766/2020 व निगरानी संख्या-1767/2020 में भी अवक्षेपित आदेश है। इन दोंनो निगरानियों में अंतर्ग्रस्त भूमि भी गाटा संख्या-841 ग्राम टिकरिया है। निगरानी संख्या-1767/2020 में निगरानीकर्तागण 1-3 क्रमशः ओम प्रकाश, विजय प्रकाश व वेद प्रकाश पुत्रगण राम मूर्ति है, जो इस निगरानी संख्या-1720/20 में विपक्षी 1-3 हैं। निगरानी संख्या-1766/2020 में निगरानीकर्तागण 1-4 क्रमशः स्व0 कन्धई के विधिक वारिस (3 पुत्र व विधवा पत्नी) हैं। निगरानीकर्तागण 5 व 6 क्रमशः राम कुमार व शिव कुमार पुत्र राम बचन हैं तथा निगरानीकर्तागण 7-11 शंकर के विधिक वारिस (4 पुत्र व पत्नी) है।

3-            निगरानी संख्या-1720/20 में निगरानीकर्ती (जो निगरानी संख्या-1767/20 में भी विपक्षी-4 है) के अधिवक्ता श्री विशाल कुमार श्रीवास्तव उपस्थित आये। उन्हांने मौखिक बहस की व लिखित बहस दिनांक 07.02.2022 प्रस्तुत की। निगरानी संख्या-1766/20 व 1767/20 में निगरानीकर्तागण के अधिवक्ता श्री ललित मोहन सिंह व उनके कनिष्ठ अधिवक्ता श्री गौरव हसानी उपस्थित आये। उन्होंने अपनी लिखित बहस दिनांक 16.02.2022 प्रस्तुत की। निगरानी संख्या-1720/20 में विपक्षी 4, 5, 6 की ओर से स्थायी अधिवक्ता श्री प्रताप सिंह जो निगरानी संख्या-1766/2020 व 1767/2020 में विपक्षीगण-1, 2, 3 की ओर से भी अधिवक्ता उपस्थित हुए। उन्होंने लिखित बहस दिनांक 21.02.2022 प्रस्तुत की। आर0सी0सी0एम0एस0 से ज्ञात हुआ कि अवक्षेपित आदेश दिनांक 20.11.2020 के विरूद्ध राजस्व परिषद लखनऊ में निगरानी संख्या 1768/2020 (राम बहादुर आदि बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं तीन अन्य) निगरानी संख्या 1721/2020 (राजप्रताप सिंह बनाम राम बहादुर एवं आठ अन्य) तथा निगरानी संख्या 1722/2020 दीपक बनाम रामसागर एवं तेरह अन्य) संस्थित है।

4-            तीनों निगरानियों में निगरानीकर्तागण की ओर से प्रस्तुत लिखित बहस संक्षेप में निम्नवत् हैः-

4.1-         गाटा संख्या-841 का पुराना गाटा संख्या-687/2 था, जिसका कन्धई पुत्र ओरी, राममूर्ति पुत्र श्रीपति के पक्ष में भूमि आवंटन का प्रस्ताव ग्रामसभा द्वारा दिनांक 09.12.1976 को हुआ। इस प्रस्ताव पर स्वीकृति उप जिलाधिकारी/परगनाधिकारी द्वारा दिनांक 09.12.1976 को दी गयी व कन्धई पुत्र ओरी आदि राजस्व अभिलेखों में असंक्रमणीय भूमिधर दर्ज हुए। दौरान चकबन्दी पुराना गाटा संख्या-687/2 से नया गाटा संख्या-841 निर्मित हुआ, जो जोत चकबंदी आ0प0 41 व 45 में अंकित रहा।

4.2-         कन्धई की मृत्यु के उपरान्त दिनांक 07.11.2016 को प0क0-11 द्वारा कन्धई के निर्विवादित उत्तराधिकारी तीन पुत्र राम सागर, राम अवध, दिलीप व विधवा रामरती का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुआ।

4.3-         साथ ही प0क0-11 में दिनांक 07.11.2016 को राममूर्ति (सह-पट्टाधारक) के स्थान पर राममूरत लिखते हुए उनके उत्तराधिकारियों का नाम राजेन्द्र, योगेन्द्र प्रसाद व राम मूरत राजस्व अभिलेखों में गलत व त्रुटिपूर्ण दर्ज हुआ। तत्क्रम में वाद संख्या-2994/ 316/18-10-2017 पंजीकृत होकर निर्णीत हुआ व आदेश दिनांक 07.11.2016 निरस्त करते हुए ओम प्रकाश, विजय प्रकाश व वेद प्रकाश पुत्रगण राममूर्ति राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुआ।

4.4-         कई वर्षां तक भू-अभिलेखों में असंक्रमणीय भूमिधर के रूप में नाम अंकित रहने के पश्चात् वाद संख्या-77 में आदेश दिनांक 25.05.2017 को व वाद संख्या-67 में आदेश दिनांक 25.05.2017 उप-जिलाधिकारी न्यायालय द्वारा पारित होने के क्रम में इन व्यक्तियों के नाम संक्रमणीय भूमिधर के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुए।

4.5-         राममूर्ति के विधिक वारिसो ने गाटा संख्या-841मि0/0.606 को विक्रय-पत्र दिनांक 25.11.2017 द्वारा विक्रय किया गया, जिसके क्रम में नायब तहसीलदार सफेदाबाद न्यायालय में वाद संख्या-1416/719 संस्थित होते हुए रीना सिंह (जो निगरानी संख्या-1720/20 में निगरानीकर्ती हैं), के पक्ष में नामान्तरण आदेश दिनांक  28.05.2019 पारित हुआ।

4.6-         क्षेत्रीय वनाधिकारी के पत्रांक संख्या-107/14-4-4 दिनांक 20.12.2018 के आधार पर एसडीओ/फारेस्ट सेटलमेंट आफिसर/उपजिलाधिकारी, नवाबगंज द्वारा मॉंगी गयी आख्या के क्रम में लेखपाल ने अपनी आख्या दिनांक 04.02.2019 को नायब तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत की। तत्पश्चात् यह आख्या तहसीलदार व उपजिलाधिकारी ने दिनांक 11.02.2019 को अग्रसारित की। इस आख्या के आधार पर मूल पट्टाधारक राममूर्ति व कन्धई को नोटिस निर्गत की गयी। राजपत्रित अधिसूचना-1906/ 14-ख-20(167)-69-विज्ञप्ति संख्या-5055/14 दिनांक 11.10.1955 के आधार पर जिलाधिकारी/कलेक्टर बाराबंकी द्वारा, आदेश दिनांक 20.11.2020 के द्वारा अंतर्ग्रस्त भूमि विषयक, धारा-128 अंतर्गत पट्टा-निरस्तीकरण आदेश पारित किया।

4.7-         कलेक्टर, बाराबंकी के आदेश दिनांक 20.11.2020 के विरूद्ध यह निगरानी राजस्व परिषद, लखनऊ में प्रस्तुत हुई। निगरानीकर्ता के अनुसार मृतक पट्टेदार के विरूद्ध कोई वाद दायर नहीं किया जा सकता है। मृतक पट्टेदारों के स्थान पर विधिक वारिस का प्रतिस्थापन अनिवार्य था, जो नहीं हुआ अतः कलेक्टर का आदेश दिनांक 20.11.2020 निरस्त होने योग्य है।

4.8-         धारा-214, राजस्व संहिता, 2006 का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि कलेक्टर न्यायालय द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 व परिसीमा अधिनियम, 1963 का पालन नहीं किया गया है।

4.9-         धारा-128 के अंतर्गत आवंटन के निरस्तीकरण हेतु प्रभावी नियम-126 राजस्व संहिता नियमावली, 2016 का पालन कलेक्टर न्यायालय द्वारा नहीं किया गया है।

4.10-       कलेक्टर के समक्ष धारा-128, उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 में वाद पोषणीय नहीं था, क्योंकि कृषि पट्टों का आवंटन 1975 में हुआ था व इसमें निरस्तीकरण की परिसीमा 1987 तक थी। अतः परिसीमा का उल्लंघन होने के कारण अवक्षेपित आदेश निरस्त होने योग्य है।

4.11-       कलेक्टर द्वारा निर्गत आदेश में धारा-230 उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 का उल्लंघन हुआ है।

4.12-       वन विभाग द्वारा प्रस्तुत आवेदन पट्टा निरस्तीकरण विषयक नहीं था, परन्तु कागजात दुरूस्ती विषयक था, जिस हेतु धारा-38 के अंतर्गत उप-जिलाधिकारी के अधिकार दिये गये हैं। अतः धारा-128 के अंतर्गत कार्यवाही मान्य नहीं थी।

4.13-       धारा-128 में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि कलेक्टर स्वयं जॉंच कर व समाधान होने पर आवंटन निरस्त करेगा, परन्तु इस प्रकरण में पट्टा निरस्तीकरण की कार्यवाही में मात्र उप-जिलाधिकारी द्वारा प्रस्तुत आख्या दिनांक 11.02.2019 के आधार पर की गयी है। ऐसी आख्या पर आधारित आख्या को कलेक्टर का व्यक्तिगत समाधान नहीं माना जा सकता है।

4.14-       उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम-126(2) व 126(3) के अंतर्गत कलेक्टर द्वारा निष्कर्ष अंकित करना चाहिए, जो नहीं किया गया है। अतः अवक्षेपित आदेश निरस्त होना चाहिए।

4.15-       रिपोर्ट दिनांक 11.02.2019 से स्पष्ट है कि नयी आराजी संख्या-836 जो पुरानी आराजी संख्या-686(अ) से बनी थी, वह चकबंदी उपरानत भी बंजर खाते में दर्ज थी व उस पर कभी भी वन विभाग का नाम दर्ज नहीं था। साथ ही पट्टा आवंटन निरस्तीकरण करने की कार्यवाही धारा-49 उ0प्र0 जोत चकबन्दी अधिनियम से बाधित है।

4.16-       पट्टेदारों को आवंटन वर्ष 1975 में गाटा संख्या-833, 836,841 व 855 का हुआ था। यह गाटा संख्या वर्ष 1975 में वन विभाग के नाम दर्ज नहीं था। ऐसी स्थिति में वन विभाग द्वारा 45 वर्ष उपरान्त किया गया दावा पोषणीय नहीं है।

5-            उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता श्री प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत लिखित दिनांक 21.02.2022 में निम्न कथन किया गया हैः-

5.1-         गजट नोटीफिकेशन संख्या-1906/14-ख-20(167)69 विज्ञप्ति संख्या-5055/ 14 दिनांक 11.10.1955 के तहत वन भूमि घोषित की गयी एवं नम्बरान व रक्बा जिलाधिकारी के आदेश में उल्लिखित किये गये, परन्तु राजस्व अभिलेखों में कुछ रक्बा वन भूमि अंकित नहीं गया है और उन्हीं गाटा संख्याओं व रक्बों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराने के लिये क्षेत्री वन अधिकारी द्वारा दर्ज कराने के लिये प्रार्थना पत्र दिया गया।

5.2-         यह महत्वपूर्ण तथ्या कि निगरानीकर्ता आवंटन का दिनांक 09.12.1976 बताते हैं परन्तु 11.10.1955 के नोटीफिकेशन के द्वारा भूमि विवादित वन विभाग की सम्पतित घोषित हो चुकी थी और उसका स्वामित्व नोटीफिकेशन के जरिये वन विभाग को प्राप्त हो चुका था वैधानिक रूप से भूलवश गॉंव सभा के खाते में दर्ज होने के बावजूद वह गॉंव सभा की सम्पत्ति नहीं थी इसलिए गॉंव सभा को आवंटन का प्रस्ताव पारित करना व उसका आवंटन करने का अधिकार ही नहीं था।

5.3-         दिनांक 09.12.1976 को गॉव सभा द्वारा आवंटन व कथित रूप से एस0डी0ओ0 द्वारा की गयी संस्तुति विधिक दृष्टि से शून्य है एवं क्षेत्राधिकार का दुरूपयोग हैं

5.4-         निगरानीकर्ता द्वारा निगरानी एवं लिखित बहस में उठाये गये बिन्दु किसी भी आधार पर स्वीकार करने योग्य नहीं हैं क्योंकि कथित पट्टेदार व उनके वारिसान द्वारा विक्रय करने के बाद भी न तो क्रेता का विवादित भूमि पर अधिकार प्राप्त हो सकता है और न हीं पट्टेदार व उसके वारिसान का कोई हक बनता है।

5.5-         वन विभाग को पूर्ण अधिकार है कि वह नोटीफिकेशन में दी गयी भूमि को अभिलेखों में दर्ज करने के लिए प्रार्थना पत्र दे।

5.6-         गजट नोटीफिकेशन दिनांक 11.10.1955 के अनुसार ग्राम टिकरिया में चकबन्दी पूर्व की गाटा संख्या-684, 685, 686, 687,688 को बंजर खाते में खारिज कर वन विभाग के नाम दर्ज कराने का नोटीफिकेशन हुआ था, जो तहसील नवाबगंज के अभिलेखागार में सुरक्षित आर-6 पर उक्त खातों को खारिज करके रिजर्ब वन घोषित करने का आदेश पत्रावली वन विभाग दिनांक 27.11.1969 पर दर्ज हैं वर्तमान में भूखण्डों की संख्या परिवर्तित हो गयी व अन्य गाटा नम्बरान बन्दोबस्त में बंजर अंकित हैं। यह आख्या तहसीलदार द्वारा दी गयी हैं

5.7-         जहॉं तक मृत व्यक्ति के विरूद्ध आदेश पारित करने का सवाल है कतई स्वीकार नहीं है क्योंकि आवंटन करने का अधिकार गॉंव सभा व उपजिलाधिकारी को नहीं था और किसी भी गलत विधि-विरूद्ध आवंटन को निरस्त करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नही की जा सकती। यह विधि व्यवस्था रिट पिटीशन संख्या-682/1998 निर्णीत दिनांक 14.03.2013 ददौर इन्टर कालेज बनाम अपर कलेक्टर में मा0 उच्च न्यायालय खण्डपीठ, लखनऊ द्वारा दी गयी है। जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि जो पट्टे ab-inito void व शून्य हैं, उन व्यक्तियों के पट्टे निरस्त किये जा सकते हैं, उनके कैन्सिलेशन के लिये कोई भी समय-सीमा निर्धारित नहीं है जब यह निश्चित हो जाये कि पट्टे आरम्भतः शून्य है तो उन्हें कभी निरस्त किया जा सकता है। इसी को आधार मानते हुए मा0 उच्चतम न्यायालय द्वारा यू0पी0 भूदान यज्ञ समिति केस में यही विधि व्यवस्था दी है।

5.8-         जिलाधिकारी द्वारा अपने निर्णय में यह पाया गया कि कन्हई पुत्र ओरीलाल व नन्दलाल पुत्र शिवनाथ व राममूरत आदि को आवंटित की गयी कृषि भूमि नोटीफिकेशन की परिधि में होने के कारण पट्टा निरस्त होने योग्य है। साथ ही साथ यह भी कहना है कि मूल आवंटी को किया गया पट्टा शून्य है उस स्थिति में किसी भी क्रेतागण व वारिसान को कोई भी न तो विधिक अधिकार रहता है और न ही उपचार प्राप्त हो सकता है।

5.9-         उपरोक्त कथनों के परिपेक्ष्य में निगरानी बलहीन है और निरस्त होने योग्य है, अवर न्यायालय द्वारा पारित आदेश विधि सम्मत होने के कारण यथावत् रहने योग्य है।

6- समस्त पक्षों के अधिवक्ताओं की बहस सुना तथा अवर न्यायालय की पत्रावली का अवलोकन किया। अभिलेखीय साक्ष्य के आधार पर स्पष्ट हुआ किः-

6.1-         पत्रावली पर उपलब्ध कार्यालय क्षेत्रीय वनाधिकारी, देवा के पत्र संख्या-107/14-4 दिनांक 20.12.2018 में, गजट नोटीफिकेशन संख्या-1906/ 14-ख-20(167)-69-विज्ञप्ति संख्या-5055/14 दिनांक 11.10.1955 का संदर्भ देते हुए, उपजिलाधिकारी, बाराबंकी को अवगत कराया है कि ग्राम टिकरिया स्थित (1) गाटा संख्या-684/1 क्षेत्रफल 3-9-15, (2) गाटा संख्या-685/2 क्षेत्रफल 13-5-0,   (3) गाटा संख्या-686/1अ क्षेत्रफल 13-12-0, (4) गाटा संख्या-687 क्षेत्रफल 29-12-0, (5) गाटा संख्या-688 क्षेत्रफल 6-10-0 (6) गाटा संख्या-841 क्षेत्रफल 125-11-5य कुल 6 गाटा कुल क्षेत्रफल 115 एकड़ (अर्थात् 46.54 हे0) में वन स्थित है। राजस्व अभिलेखों में मात्र 31.7600हे0, गाटा संख्या-924 पर वन भूमि अंकित है। इस तरह राजस्व अभिलेखों में 14.78हे0 पर वन-भूमि दर्ज नहीं है। क्षेत्रीय वनाधिकारी द्वारा उपजिलाधिकारी से अनुरोध किया गया कि पुराने गाटा संख्या से नये गाटा संख्या निर्धारित किये जा चुके हैं, जिसका आ0प0 41 व 45 के विवरण प्राप्त किया जा सकता है व पूर्व में हुई गजट नोटीफिकेशन के क्रम में ग्राम टिकरिया में, वन भूमि का इंद्राज-राजस्व अभिलेखों में करने का आदेश पारित करने का कष्ट करें।

6.2- तत्कालीन लेखपाल (श्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय) ग्राम टिकरिया की आख्या दिनांक दिनांक 04.02.2019, (जो क्षेत्रीय वन अधिकारी के पत्र दिनांक 20.12.2018 के क्रम में दी है गयी है) के मुख्य अंश निम्नवत् हैः-

(क)-   मा0 राज्यपाल महोदय उत्तर प्रदेश गजट नोटीफिकेशन संख्या 1906/14 ख-20(167)-69-विज्ञप्ति संख्या 5055/14 दिनांकित 11.10.1955 के अनुसार ग्राम टिकरिया में चकबन्दी पूर्व की गाटा संख्या-684/1 रकबा 309.15 685/2 रकबा 13.05.0 व गाटा संख्या 686 अ रकबा 13.12.0 687 रकबा 21.12.0, 688 रकबा 6.10.0 841 रकबा 125.11.05 कुल 184.0.0 बीघा अर्थात 46.552 हे0 बंजर खाते से खारिज वन विभाग के नाम दर्ज होने का नोटीफिकेशन हुआ था। तहसील नवाबगंज के अभिलेखागार में सुरक्षित त्.6 पर उक्त भूखण्डों को खातों से खारिज होकर रक्षित वन घोषित का आदेश द्वारा पत्रावली वन विभाग दिनांक 27.11.1979 दर्ज है।

(ख)- गजट उपरान्त ग्राम टिकरिया में चकबन्दी होने के कारण वन विभाग के नाम भूखण्डों का नम्बर परिवर्तित हो गया है। चकबन्दी के उपरान्त उपरोक्त भूखण्डों से परिवर्तित बंजर खाते में बन्दोबस्त (जो0च0आ0 पत्र-45) के अनुसार गाटा संख्या-841 रकबा 31.760हे0 जिसका नया नम्बर गाटा संख्या 924मि/31.760हे0 वर्तमान खतौनी की खाता संख्या 602 पर वन विभाग के नाम अंकित है। शेष भूखण्डों का अभिलेखों में अंकन नहीं है।

(ग)- चकबन्दी के बाद गजट की गाटा संख्या 684/1 रकबा 0.882 हे0 से परिवर्तित नई गाटा संख्या 826/0.126, 828मि/0.756हे0 कुल भूमि 0.882 बंजर खाते में ब्ण्भ्ण्45 व वर्तमान अभिलेखें में अंकित है। गाटा संख्या 685/2/3.354 से चकबन्दी उपरान्त 834/1.675 हे0 व गाटा संख्या 833/1.119हे0 बन्दोबस्त में बंजर अंकित हैं। गाटा संख्या 686 अ/3.444 का चकबन्दी उपरान्त गाटा संख्या 839/0.253, 836/0.923हे0 बन्दोबस्त में बंजर अंकित है। गाटा संख्या 687 रकबा 5.468 हे0 चकबन्दी उपरान्त परिवर्तित गाटा संख्या 841/1.366हे0 बन्दोबस्त में बंजर अंकित है। गाटा संख्या 688 रकबा 1.644 हे0 चकबन्दी उपरान्त परिवर्तित गाटा संख्या 855/0.771हे0 बन्दोबस्त में बंजर अंकित है।

(घ)- गजट में आवंटित भूमि का अभिलेखों में अनुपालन न होने के कारण अभिलेखीय बंजर भूमि अंकन से दिनांक 09.12.1975 को कृषि आवन्टन में गाटा संख्या 833मि/0.866, 836/0.923, 841/1.366, 855/0.771 कुल 4 कि 3.926 हे0 स्वीकृत होने के कारण अभिलेखों में अंकन है।

(च)- वन विभाग की भूमि होने के कारण आबन्टन निरस्त योग्य हैं आवंटियों का व्यौरा निम्नवत है :-

(च-1)- गाटा संख्या 833मि/0.253 हे0 का कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार कन्धई पुत्र ओरी निवासी ग्राम के पक्ष में हुआ था। आवन्टी के मृत्यु उपरान्त उनके वारिस रामसागर, राम अवध, दिलीप कुमार, लल्लू प्रसाद पुत्रगण कन्धई व श्रीमती रामरती पत्नी स्व0 कन्धई (जो निगरानी संख्या-1766/20 में निगरानीकर्तागण 1-4 हैं साथ ही निगरानी संख्या 1722/2020 में विपक्षी 1-4 भी हैं) के द्वारा दिनांक 25.11.2011 को कृष्ण कुमार पुत्र अवधराम निवासी मवईकला परगना महोना तहसील बख्शी का तालाब, लखनऊ वर्तमान पता निवासी मकान नं0 2/49 प्रियदर्शनी कालोनी सीतापुर रोड लखनऊ के पक्ष में कर दिया गया था। श्रीमान उपजिलाधिकारी नवाबगंज वाद संख्या 266/21.5.12 के अनुसार उक्त खाते की भूमि को धारा 143 ज0वि0अधि0 के अन्तर्गत अकृषिक घोषित किया गया। क्रेता कृष्ण कुमार द्वारा उक्त भूमि को प्लाट में विक्रय कर दिया गया वर्तमान खतौनी खाता संख्या 70 कृष्ण कुमार पुत्र अवध राम निवासी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.030हे0 व खाता संख्या 470 श्रीमती दयावन्ती पत्नी जिया लाल निवासी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.109 खाता संख्या 036 पर अखिलेश पुत्र राम चन्द्र निवासी देह के नाम गाटा 833मि/0.030 खाता संख्या-128  पर डाक्टर विभा त्रिपाठी पत्नी गजेन्द्र त्रिपाठी निवासिनी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.025 खाता सख्या 125 पर दिलशेर यादव पुत्र राम भरोसे निवासी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.059 हे0 जरिए बैनामा अंकित हैं।

(च-2)-गाटा संख्या 833मि/0.253 का कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार आवंटी गुरू प्रसाद पुत्र गंगा प्रसाद निवासी ग्राम के पक्ष में हुआ था। आवंटी के द्वारा दिनांक 18.06.2012 को अरविन्द पुत्र राजेन्द्र प्रसाद निवासी टिकरिया के पक्ष विक्रय कर दिया गया। क्रेता द्वारा वर्तमान खतौनी को खाता संख्या 508 पर अंकित खातेदार श्रीमती शिवपती सिंह पत्नी गुरू मिलन सिंह निवासिनी देह श्रीमती योशोदा वर्मा पत्नी सजीवन लाल वर्मा निवासिनी देह विजय कुमार त्रिपाठी पुत्र रामरूप निवासी देह, श्रीमती नीता तिवारी पत्नी दिलीप कुमार निवासी देह, भगवानदीन पुत्र राजाराम निवासी देह, धनंजय सिंह पुत्र महीपाल सिंह निवासी देह, विभा भारती गोस्वामी पुत्री कामता प्रसाद निवासिनी देह, श्रीमती संध्यारान पत्नी विश्वजीत निवासिनी देह, प्रभात कुमार सिंह पुत्र चन्द्रशेखर सिंह निवासी देह, अनिल जोशी पुत्र यशपला निवासी देह, अखिलेश कुमार दूबे पुत्र ठाकुर प्रसाद दूबे निवासी देह जरिये बैनाम अंकित है। 

(च-3)-गाटा संख्या 833मि/0.107हे0 कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार दीनानाथ पुत्र राम दूबे के पक्ष में हुआ था। वर्तमान खतौनी खाता संख्या 137 पर आवंटी का नाम अंकित है।

(च-4)-गाटा संख्या 833मि/0.253हे0 कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार श्रवण कुमार पुत्र नन्दकुमार निवासी ग्राम के पक्ष में हुआ था। आवंटी द्वारा दिनांक 15.05.2012 को राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल पुत्र राममूर्ति शुक्ल निवासी ग्राम को बैनामा कर दिया था। क्रेता राजेन्द्र प्रसाद द्वारा आंशिक भाग प्लाट के रकबा बैनामा कर दिया गया है। वर्तमान खतौनी के खाता संख्या 286 पर राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल पुत्र राममूर्ति शुक्ल निवासी ग्राम के नाम गाटा संख्या 833मि/0.112हे0 व गाटा संख्या 381 पर श्यामधर मौर्य पुत्र शीतला प्रसाद मौर्य निवासी दे हके नाम गाटा संख्या 833मि/0.030हे0 सभापति मौर्य पुत्र शीतला प्रसाद मौर्य निवासी देह 833मि/0.030हे0, खाता संख्या 428 पर सुभाष चन्द्र मौर्य पुत्र शीतला प्रसाद मौर्य निवासी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.030हे0 व खाता संख्या 012 पर अमरेश पुत्र राम प्रकाश निवासी देह के नाम गाटा संख्या 833मि/0.023हे0 जरिये बैनामा अंकित है।

(च-5)-गाटा संख्या 836मि/0.461हे0 कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार राजदेव पुत्र स्वामीनाथ  निवासी ग्राम के पक्ष में हुआ था। आवंटी राजदेव मृत्यु उपरान्त उनके वारिस राजेन्द्र, पप्पू, रामचन्दर, प्रेम नरायन पुत्रगण राजदेव के द्वारा दिनांक 30.11.2013 को श्रीमती रेखा देवी पत्नी मंशा राम निवासी विशेषरपुरवा, परगना देवा, तहसील नवाबगंज के पक्ष में कर दिया गया व गाटा संख्या 836मि/0.462हे0 का आवंटन राम अवध पुत्र जगदेव निवासी ग्राम के पक्ष में हुआ था। आवंटी के द्वारा दिनांक 03.11.2013 को उक्त भूखण्ड का बैनामा विनोद कुमार पुत्र राम नरेश के पक्ष में कर दिया गया था। दोनो क्रेता श्रीमती रेखा देवी व विनोद कुमार के (निगरानी संख्या 1721/2020 में विपक्षी) द्वारा अपना सम्पूर्ण भाग अर्थात गाटा संख्या  836मि/0.923हे0 का बैनामा दिनांक 29.05.2014 को आर0पी0 ग्रीन स्टेट प्रा0लि0 द्वारा चेयरमैन राजप्रताप सिंह पुत्र राजमंगल सिंह निवासी देह (निगरानी संख्या 1721/2020 में निगरानीकर्ता व निगरानी संख्या 1768/2020 में विपक्षी) के पक्ष में कर दिया गया है। वर्तमान खतौनी में गाटा संख्या 836 क्रेतागण के नाम खाता संख्या 49, 42, 120, 178, 354, 447, 452, 477, 480, 484, 486, 502, 511, 514, 520 जरिये बैनामा अंकित है।

(च-6)-गाटा संख्या 841 रकबा 1.366हे0 कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार कन्धई पुत्र ओरी निवासी ग्राम के नाम गाटा संख्या 841मि/0.303हे0 व नन्दलाल पुत्र शिवनाथ निवासी ग्राम के नाम गाटा संख्या 841मि/0.457हे0 व राममूरत पुत्र श्रीपति निवासी ग्राम के नाम 841मि/0.606हे0 पट्टा हुआ था। पट्टेदार कन्धई मृतक के वारिस रामसागर, राम अवध, दिलीप पुत्रगण कन्धई व रामरती उर्फ सोनमती पत्नी कन्धई निवासिनी दे हके द्वारा दिनांक 22.01.2017 को बैनामा दीपक पुत्र मिश्री लाल पुत्र रमाकान्त मिश्रा (निगरानी संख्या-1766/20 में विपक्षी तथा निगरानी संख्या 1722/2020 में निगरानीकर्ता) निवासी देह के पक्ष में कर दिया गया है, खाता संख्या 588 पर अंकन है। व श्रीमान् तहसीलदार महोदय नवाबगंज वाद संख्या 2924/316/13.10.2017 के आदेश से अंकित राममूरत पुत्र श्रीपती के वारिस ओमप्रकाश, विजय प्रकाश, वेदप्रकाश पुत्रगण राममूर्ति (निगरानी संख्या-1767/20 के निगरानीकर्तागण 1-3 तथा निगरानी संख्या 1720/2020 में विपक्षी 1-3) के द्वारा दिनांक 25.11.2017 को गाटा संख्या 841मि/0.606हे0 का बैनामा आर0पी0 ग्रीन सिटी प्रा0लि0 द्वारा निदेशक श्रीमती रीना सिंह पत्नी राजप्रताप सिंह (निगरानी संख्या-1720/20 में निगरानीकर्ती व निगरानी संख्या 1767/2020 में विपक्षी) निवासिनी 297, ब्लाक-बी, दयाल रेजीडेन्सी फैजाबाद रोड शहर लखनऊ कर दिया गया है जिसका नामान्तरण न्यायालय श्रीमान तहसीलदार सफेदाबग बाराबंकी विचाराधीन है।

(च-7)-गाटा संख्या 855 रकबा 0.771हे0 कृषि आवंटन स्वीकृत दिनांक 09.12.1975 के अनुसार रामबचन पुत्र नहौरी के पक्ष में हुआ था। वर्तमान खतौनी की खाता संख्या 300 पर अंकित पट्टेदार मृतक के वारिस राम कुमार, शिव कुमार, रवीन्द्र कुमार, सुरेन्द्र कुमार, योगेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र कुमार पुत्रगण शंकर निवासी ग्राम व श्रीमती सोनावती पत्नी शंकर निवासी (निगरानी संख्या-1766/20 में निगरानीकर्तागण 5-11 तथा निगरानी संख्या 1722/2020 में विपक्षी 5-11) ग्राम के द्वारा विक्रय कर दिया गया है। श्रीमान उप जिलाधिकारी महोदय नवाबगंज वाद संख्या 30/2016/20.12.16 के अनुसार गाटा संख्या 855मि/0.771हे0 अकृषिक प्रयोजन उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता धारा 80 के तहत घोषित किया गया है। क्रेता दीपक (निगरानी संख्या-1766/20 में विपक्षी तथा निगरानी संख्या 1722/2020 में निगरानीकर्ता) के द्वारा दिनांक 21.06.2017 को गाटा संख्या 855मि/0.371हे0 का विक्रय श्रीमती संतोष सिंह पत्नी ऋषिराज सिंह निवासिनी देह के पक्ष में कर दिया गया है। दिनांक 13.11.2017 को गाटा संख्या 855मि/0.018हे0 का बैनामा क्रेता दीपक के द्वारा ऋषिराज सिंह पुत्र श्री विशम्भर सिंह निवासी देह के पक्ष में कर दिया गया है। व क्रेता दीपक के द्वारा दिनांक 30.11.2017 को बैनामा गाटा संख्या 855मि/0.381हे0 श्रीमती संतोष सिंह पत्नी ऋषिराज सिंह निवासिनी देह के पक्ष में कर दिया गया है। समस्त व्यौरा वर्तमान खतौनी की खाता संख्या 300 पर अंकित है।

(ज)-   अंत में क्षेत्रीय लेखपाल द्वारा वन विभाग के पक्ष में, गजट नोटीफिकेशन के अनुसार, बन्दोबस्ती बंजर भूमि गाटा संख्या 833मि/0.866हे0, 836मि/0.923हे0, 841मि/1.366हे0, 855मि/0.771हे0 कुल 4 कि 3.926हे0 (वन भूमि) का आबंटन हो जाने के कारण निरस्त करने योग्य पाया। तत्क्रम में समस्त आवंटियों, जो उपरोक्त प्रस्तर (च-1) से (च-7) में अंकित हैं, पर अंकित व्यक्तियों का नाम उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 128 के तहत निरस्त कर भूमि वन विभाग के नाम अंकित किये जाने हेतु आख्या प्रेषित की। 

6.3-         लेखपाल की आख्या दिनांक 04.02.2019 (उपरोक्त प्रस्तर-6.2) राजस्व निरीक्षक, नायब तहसीलदार नवाबगंज, तहसीलदार व उपजिलाधिकारी, नवाबगंज द्वारा कलेक्टर, बाराबंकी के समक्ष दिनांक 11.02.2019 को अग्रसारित की गयी।

6.4-         दिनांक 18.02.2019 को कलेक्टर, बाराबंकी द्वारा आदेश पत्रक पर यह आदेश अंकित किया गया कि ‘‘यह वाद उपजिलाधिकारी की आख्या दिनांक 01.02.2019 (यह लिपिकीय/टंककीय त्रुटि है यह तिथि 11.02.2019 होनी चाहिए थी) के आधार पर धार-1280प्र0 राजस्व संहिता के अंतर्गत प्राप्त हुआ। अतः वाद दर्ज/पंजीकृत होकर नियमानुसार निरस्तीकरण हेतु अपर जिलाधिकारी, बाराबंकी के न्यायालय में स्थानांतरित किया गया।’’

6.5-       न्यायालय, अपर कलेक्टर, बाराबंकी द्वारा 19 व्यक्तियों (यथा-रामसागर, दिलीप कुमार, राम अवध, लल्लू प्रसाद पुत्रगण स्व0 कन्धई, रामरती पत्नी स्व0 कन्धई, गुरू प्रसाद पुत्र गंगा प्रसाद, दीनानाथ पुत्र रामदुबे, श्रवण कुमार पुत्र नन्द कुमार, राजेन्द्र, रामचन्द्र, पप्पू, प्रेमनारायण पुत्रगण राजदेव, रामकुमार, शिवकुमार, रवीन्द्र कुमार, सुरेन्द्र कुमार, योगेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र कुमार पुत्रगण शंकर व सोनावती पत्नी शंकर समस्त निवासीगण ग्राम-टिकरिया) को नोटिस अंतर्गत धारा-128 उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 दिनांक 19.02.2020 निर्गत की।

6.6-       वाद संख्या-00523/2020 में धारा-212(2) उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत कलेक्टर/जिलाधिकारी, बाराबंकी द्वारा आदेश दिनांक 06.03.2020 पारित करते हुए अपर कलेक्टर, बाराबंकी के समक्ष विचाराधीन वाद 2757/2019 पुनः अपने न्यायालय (अर्थात् जिलाधिकारी/कलेक्टर, न्यायालय) में सुनवाई हेतु स्थानांतरित किया।

6.7-         स्व0 कन्धई के विधिक वारिसों द्वारा अपना पक्ष/आपत्ति कलेक्टर न्यायालय में दिनांक 29.06.2020 को प्रस्तुत किया। दोनों पक्षों की सुनवाई पश्चात् जिलाधिकारी द्वारा दिनांक 20.11.2020 को अंतिम निर्णय पारित किया गया।

6.8-         अवर न्यायालय की पत्रावली पर उपलब्ध फारेस्ट सेटलमेंट आफिसर/सब डिवीजन आफिसर द्वारा दिनांक 26.06.1962 में की घोषणा-विज्ञप्ति के प्रस्तर-1 में यह इंगित किया है कि भारतीय वन अधिनियम,16 सन् 1927 की धारा-4 के अंतर्गत, श्री राज्यपाल महोदय उत्तर प्रदेश, नोटीफिकेशन नं0 5055/14-11-10-55 के अंतर्गत, बाराबंकी जिले की संलग्न अनुसूची में अंकित भूमि को ‘‘सुरक्षित वन’’ बनाना प्रस्तावित है। घोषणा से संलग्न अनुसूची में उपरोक्त प्र्रस्तर-6.1 में अंकित कुल 06 गाटाओं 184 बीघा =115 एकड़ की भूमि स्पष्ट रूप से इंगित है।

6.9-         अवर न्यायालय की पत्रावली पर उपलब्ध उत्तर प्रदेश असाधारण गजट 31 दिसम्बर, 1970 के पृष्ठ 551 की प्रति से स्वतः सिद्ध है कि दिनांक 27 जुलाई, 1970 को, भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के अंतर्गत दिनांक 28 फरवरी, 1971 से अनुसूची में निर्दिष्ट भूमि को रक्षित वन घोषित किया गया है। अनुसूची में जिला बाराबंकी, तहसील नवाबगंज परगना देवां ग्राम-टिकरिया (जो वन ब्लाक टिकरिया में सम्मिलित है), वे उपरोक्त प्रस्तर-6.1 में इंगित कुल 6 गाटाओं की 115 एकड़ की भूमि सम्मिलित है।

6.10-उपरोक्त प्रस्तर-6.1, 6.8 व 6.9 से स्वतः सिद्ध है कि विवादित भूमि विषयक धारा-4, भारतीय वन अधिनियम, 1927 दिनांक 26.06.1962 को हुई थी व धारा-20 के अंतर्गत रक्षित/सुरक्षित वन की घोषणा दिनांक 27 जुलाई, 1970 को हुई थी। दिनांक  28 फरवरी, 1971 से धारा-20 भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत ‘‘रक्षित वन’’ घोषित है।

7-            भारतीय वन अधिनियम, 1927(यथा संशोधित उ0प्र0 संशोधन, 1965) विषयक मा0 सर्वाच्च न्यायालय के दो सदस्यीय खण्डपीठ द्वारा सिविल अपील संख्या-7017 /2009 (प्रभारी वन अधिकारी, अवध वन प्रभाग बनाम अरूण कुमार भारद्वाज) में पारित निर्णय दिनांक 05.10.2021 अत्यधिक प्रासंगिक एवं सम्पूर्णतया प्रायोज्य है। मा0 सर्वाच्च न्यायालय द्वारा निर्णय दिनांक 05.10.2021 के प्रस्तर-23, 25, 26, 27, 28 में निम्न विधिक सिद्धान्त स्थापित किये हैं:-

23. Learned counsel for the appellant referred to a judgment reported as State of U.P. v. Dy. Director of Consolidation & Ors. ((1996) 5 SCC 194) wherein the land was notified as a reserved forest under Section 20 of the Forest Act but the respondents in appeal before this Court claimed that they were in possession of the land and had acquired Sirdari rights. This Court held that in terms of the Abolition Act, the State was the proprietor of the land and the respondents, even if they were Sirdars, would still be tenure[1]holders. It was also held that the Consolidation Authorities have no jurisdiction to go behind the notification under Section 20 of the Forest Act. The Court held as under:

“7. It is thus obvious that a person who was holding the land as Sirdar was not vested with proprietary rights under the Abolition Act. He was a tenure-holder and the proprietary rights vested with the State. The High Court, therefore, fell into patent error in assuming that by virtue of their status as Sirdars the respondents were proprietors of the land. The State being the proprietor of the land under the Abolition Act, it was justified in issuing the notification under Section 4 of the Act.

xx xx xx

10. It is thus obvious that the Forest Settlement Officer has the powers of a civil court and his order is subject to appeal and finally revision before the State Government. The Act is a complete code in itself and contains elaborate procedure for declaring and notifying a reserve forest. Once a notification under Section 20 of the Act declaring a land as reserve forest is published, then all the rights in the said land claimed by any person come to an end and are no longer available. The notification is binding on the consolidation authorities in the same way as a decree of a civil court. The respondents could very well file objections and claims including objection regarding the nature of the land before the Forest Settlement Officer. They did not file any objection or claim before the authorities in the proceedings under the Act. After the notification under Section 20 of the Act, the respondents could not have raised any objections qua the said notification before the consolidation authorities. The consolidation authorities were bound by the notification which had achieved finality.”

25. In a judgment reported as State of Uttarakhand and Ors. v. Kumaon Stone Crusher ((2018) 14 SCC 537), an argument was raised that since notification under Section 20 of the Forest Act has not been published therefore, land covered by notification issued under Section 4 cannot be regarded as forest. This Court negated the argument relying upon Section 5 of the Forest Act as amended in State of Uttar Pradesh by U.P. Act No. 23 of 1965. It was held that regulation by the State comes into operation after the issue of notification under Section 4 of the Forest Act and that absence of notification under Section 20 of the Forest Act cannot be accepted. The Court held as under:

“145. At this juncture, it is also necessary to notice one submission raised by the learned counsel for the petitioners. It is contended that the State of Uttar Pradesh although issued notification under Section 4 of the 1927 Act proposing to constitute a land as forest but no final notification having been issued under Section 20 of the 1927 Act the land covered by a notification issued under Section 4 cannot be regarded as forest so as to levy transit fee on the forest produce transiting through that area. With reference to the above submission, it is sufficient to notice Section 5 as inserted by Uttar Pradesh Act 23 of 1965 with effect from 25-11-1965. By the aforesaid U.P. Act 23 of 1965 Section 5 has been substituted to the following effect:

 “5. Bar of accrual of forest rights.—After the issue of the notification under Section 4 no right shall be acquired in or over the land comprised in such notification, except by succession or under a grant or a contract in writing made or entered into by or on behalf of the Government or some person in whom such right was vested when the notification was issued; and no fresh clearings for cultivation or for any other purpose shall be made in such land, nor any tree therein felled, girdled, lopped, tapped, or burnt, or its bark or leaves stripped off, or the same otherwise damaged, nor any forest produce removed therefrom, except in accordance with such rules as may be made by the State Government in this behalf.”

146. Section 5 clearly provides that after the issue of the notification under Section 4 no forest produce can be removed therefrom, except in accordance with such rules as may be made by the State Government in this behalf. The regulation by the State thus comes into operation after the issue of notification under Section 4 and thus the submission of the petitioners that since no final notification under Section 20 has been issued they cannot be regulated by the 1978 Rules cannot be accepted.”

 26. This Court in a judgment reported as Prahlad Pradhan and Ors. v. Sonu Kumhar and Ors. ((2019) 10 SCC 259) negated argument of ownership based upon entries in the revenue records. It was held that the revenue record does not confer title to the property nor do they have any presumptive value on the title. The Court held as under:

“5. The contention raised by the appellants is that since Mangal Kumhar was the recorded tenant in the suit property as per the Survey Settlement of 1964, the suit property was his self-acquired property. The said contention is legally misconceived since entries in the revenue records do not confer title to a property, nor do they have any presumptive value on the title. They only enable the person in whose favour mutation is recorded, to pay the land revenue in respect of the land in question. As a consequence, merely because Mangal Kumhar’s name was recorded in the Survey Settlement of 1964 as a recorded tenant in the suit property, it would not make him the sole and exclusive owner of the suit property.”

27. The six yearly khatauni for the fasli year 1395 to 1400 is to the effect that the land stands transferred according to the Forest Act as the reserved forest. Such revenue record is in respect of Khasra No. 1576. It is only in the revenue record for the period 1394 fasli to 1395 fasli, name of the lessees find mention but without any basis. The revenue record is not a document of title. Therefore, even if the name of the lessee finds mention in the revenue record but such entry without any supporting documents of creation of lease contemplated under the Forest Act is inconsequential and does not create any right, title or interest over 12 bighas of land claimed to be in possession of the lessee as a lessee of the Gaon Sabha.

28. The High Court had referred to the objections filed by the lessees under the Consolidation Act and also objections by the Forest Department. It was held by the High Court that since no objections were filed by the Forest Department earlier, therefore, the objections would be barred by Section 49 of the Consolidation Act. We find that such finding recorded by the High Court is clearly erroneous. The land vests in the Forest Department by virtue of notification published under a statute. It was the lessee who had to assert the title on the forest land by virtue of an agreement in writing by a competent authority but no such agreement in writing has been produced. Therefore, the lessee would not be entitled to any right only on the basis of an entry in the revenue record.

8-            उपरोक्त प्रस्तर-7 में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय दिनांक 05.10.2021 में निम्न विधिक व्यवस्था पूर्णतया स्थापित हो गयी हैः-

8.1-         भारतीय वन अधिनियम, 1927 (यथा संशोधित उ0प्र0 संशोधन 1965) के सुसंगत प्राविधानों के अंतर्गत ‘‘सुरक्षित वन’’ (reserved forest) विषयक विज्ञप्ति निर्गत होने के उपरान्त उस भूमि विषयक पट्टेदार/भू-धारक, यदि राजस्व अभिलेखों में विद्यमान प्रविष्टियों के आधार पर स्वत्व की मॉंग करता है, तो उसे ऐसे स्वत्व का कोई आधार/अधिकार प्राप्त नहीं है।

8.2- धारा 49 चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत भी ऐसी भूमि पर वन विभाग के अधिकारों पर प्राड.-न्याय सिद्धान्त (Res-Judicata) प्रभावी नहीं होता है।

9-            मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद के दो सदस्यीय पीठ द्वारा रिट याचिका संख्या 1698/2012 (राधेश्याम एवं अन्य बनाम प्रमुख सचिव राजस्व उत्तर प्रदेश एवं अन्य) तथा रिट याचिका संख्या 4242/2015 (प्रभुदयाल बनाम कलेक्टर सुलतानपुर) में पारित निर्णय दिनांक 13.07.2017 भी इस प्रकरण में प्रायोज्य है। निर्णय दिनांक 13.07.2017 का सुसंगत अंश निम्नवत हैः-

94- We have considered the rival contention made by learned Counsel for the petitioners as well as learned Counsel for the respondents and we are of the view that land has been declared as forest reserve in the year 1950-55 and at present land in dispute including the major area is now used as forest land, and no right title had ever accrued in favour of the petitioners. A suit regarding rights over the land has been decided by the competent civil court and has been dismissed. A mutation proceedings has been decided by the competent revenue court thus both the petitions lacks merit and deserves to be dismissed.

95- Before parting with the order, we are of the view to direct the Chief Secretary of U.P. to constitute a Committee consisting Principle Conservator of forest with Commissioner/ District Magistrate/ Divisional Forest Officer/ Sub Divisional Magistrate or any other Officer as may be deemed fit, having jurisdiction over local area and to examine and verifying the records relating to land vested in the State Government/declared as forest reserved or forest land and to ensure that the land actually vested in the State Government vide notification/order or by operation of any Law be entered in the relevant records and name of the State Government accordingly be corrected and incorporated. Copy of the same be kept with the Principle Conservator of Forest and concerned revenue records.

10-          मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित अद्यतन निर्णय दिनांक 05.10.2021(उपरोक्त प्रस्तर-7 व 8) में स्थापित विधिक व्यवस्था के आधार पर अंतर्ग्रस्त भूमि में किसी भी पक्ष को किसी प्रकार का अधिकार (चाहे पट्टा धारक हो, चाहे संक्रमणीय भूमिधर हो, चाहे असंक्रमणीय भूमिधर हो) प्राप्त नहीं हो सकता है। यह भूमि ‘‘सुरक्षित/रक्षित वन’’ है व इस भूमि में मात्र वन विभाग का एकाधिकार है, जो धारा-49 चकबन्दी अधिनियम से भी बाधित नहीं है। अतः जिलाधिकारी द्वारा पारित अवक्षेपित आदेश दिनांक 20.11.2020 में कोई हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। निगरानीकर्ती द्वारा प्रस्तुत तर्क (उपरोक्त प्रस्तर-4.1-4.6) तथ्यात्मक है, उस पर इस न्यायालय को कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है। निगरानीकर्ती द्वारा प्रस्तुत शेष विधिक तर्क (उपरोक्त प्रस्तर-4.7-4.16), मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक व्यवस्था के आलोक में बलहीन/आधारहीन है। विपक्षी, उ0प्र0 सरकार की ओर से प्रस्तुत तर्क (उपरोक्त प्रस्तर-5.1-5.9) में पर्याप्त बल है। अतः यह निगरानी निरस्त करने योग्य है। साथ ही अवक्षेपित आदेश द्वारा धारा-210(1) उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 के खण्ड (क), (ख) अथवा खण्ड (ग) का उल्लंघन नहीं हुआ है अतः निगरानी अस्वीकार करते हुए निरस्त करने योग्य है।

11-          उल्लेखनीय है कि कार्यालय क्षेत्रीय वनाधिकारी, देवा के पत्र संख्या-107/14-4 दिनांक 20.12.2018 में चकबन्दी पूर्व के कतिपय गाटाओं में से क्षेत्रफल 14.78हे0 पर वन विभाग का नाम अंकित करने का अनुरोध किया था (प्रस्तर-6.1), परन्तु अवक्षेपित आदेश दिनांक 20.11.2020 में कलेक्टर बाराबंकी द्वारा चकबन्दी पश्चात के गाटा संख्या-833/0.866हे0, गाटा संख्या-836/0.923हे0, गाटा संख्या-841/1.366हे0, गाटा संख्या-855/0.771हे0, कुल 04 गाटा कुल क्षेत्रफल 3.926हे0 स्थित ग्राम-टिकारिया, परगना देवां, तहसील नवाबगंज, जिला बाराबंकी में ही मात्र वन विभाग का नाम अंकित करने का आदेश पारित किया है। स्पष्टतः शेष क्षेत्रफल (14.78-3.926=10.854हे0) पर कलेक्टर बाराबंकी/उपजिलाधिकारी, नवाबगंज द्वारा मा0 उच्च न्यायालय के निदेश (उपरोक्त प्रस्तर-9) व मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक व्यवस्था के आलोक में भू-अभिलेखों में विधि अनुसार प्रक्रिया अपनाते हुए वन विभाग का नाम अंकित करना शेष है। अतः इस आशय के निर्देश भी उपरोक्त अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों को प्रेषित करना न्यायोचित होगा। 

12-          उपरोक्त प्रस्तर-7-11 के मध्य की गयी विवेचना के आधार पर निम्न निर्देश निर्गत करते हुए यह निगरानी अस्वीकार करते हुए निरस्त की जाती हैः-

12.1-       जिलाधिकारी/कलेक्टर, बाराबंकी द्वारा गाटा संख्या-833/0.866हे0, गाटा संख्या-836/0.923हे0, गाटा संख्या-841/1.366हे0, गाटा संख्या-855/0.771हे0, कुल 04 गाटा कुल क्षेत्रफल 3.926हे0 स्थित ग्राम-टिकरिया, परगना-देवां, तहसील, नवाबगंज विषयक धारा-128 उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत निर्गत आदेश दिनांक 20.11.2020 की पुष्टि की जाती है। उप-जिलाधिकारी, नवाबगंज तद्नुसार भू-राजस्व अभिलेखों में ‘‘वन-भूमि’’ की प्रविष्टि अंकित करना सुनिश्चित करें।

12.2-       जिलाधिकारी, बाराबंकी एवं उप-जिलाधिकारी, नवाबगंज प्रस्तर-11 में इंगित उर्वरित क्षेत्रफल 10.854हे0, जो चकबन्दी पश्चात् निर्मित नये गाटा संख्याओं में सम्मिलित होंगे, को चिन्हित करते हुए विधि अनुसार स्थापित प्रक्रिया का अनुपालन करने के पश्चात् भू-अभिलेखों में वन विभाग के नाम से अंकित करना सुनिश्चित करें।

12.3- यह आदेश निगरानी संख्या-1766/20, 1767/20 पर समान रूप से प्रभावी होगा। निबंधक इस आदेश की प्रति इस न्यायालय में विचाराधीन अन्य निगरानी संख्या-1722/20 (दीपक बनाम रामसागर एवं तेरह अन्य), जिसमें अग्रेतर सुनवाई की तिथि 20.05.2022 निर्धारित है में, पीठासीन अधिकारी/न्यायालय के उपयोगार्थ एवं संज्ञानार्थ भी, रखना सुनिश्चित करें। मा0 सदस्य, राजस्व परिषद, लखनऊ (श्री रजनीश गुप्ता) न्यायालय में विचाराधीन निगरानी संख्या-1721/20 (राजप्रताप सिंह बनाम राम बहादुर एवं आठ अन्य) व निगरानी संख्या-1768/2020 (राम बहादुर आदि बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं तीन अन्य) में भी न्यायालय के उपयोगार्थ इस आदेश की प्रति रखी जायेगी। साथ ही इस आदेश की प्रति तहसीलदार, उप जिलाधिकारी-नवाबगंज, जनपद-बाराबंकी को जिलाधिकारी, बाराबंकी के माध्यम से ई-मेल द्वारा प्रेषित की जाये और मण्डलायुक्त, अयोध्या को भी ई-मेल द्वारा प्रेषित की जाये।

12.4- अवर न्यायालय के अभिलेख वापस प्रेषित किये जाये व बाद आवश्यक कार्यवाही पत्रावली संचित अभिलेखागार हो।

 

 (डा0 सुधीर महादेव बोबडे)

सदस्य (न्यायिक)

25.02.2022